{"version":"1.0","type":"rich","provider_name":"Acast","provider_url":"https://acast.com","height":250,"width":700,"html":"<iframe src=\"https://embed.acast.com/$/5ec3d9497cef7479d2ef4798/5ec3da2e7cef7479d2ef482f?\" frameBorder=\"0\" width=\"700\" height=\"250\"></iframe>","title":"एनएल चर्चा 58: भारत-पाकिस्तान तनाव, चैनलों को नोटिस और अन्य","thumbnail_width":200,"thumbnail_height":200,"thumbnail_url":"https://open-images.acast.com/shows/5ec3d9497cef7479d2ef4798/61b4ab4eef2b85871e797f184090010e.jpg?height=200","description":"बीता पूरा हफ़्ता काफ़ी उठापटक भरा रहा. चर्चा में उन्हीं में से कुछ विषयों पर विस्तार से बात की गई. इस हफ़्ते की सबसे महत्वपूर्ण घटना रही, भारत और पाकिस्तान के हवाई हमलों के बाद पैदा हुआ तनाव. पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी ठिकानों पर कार्रवाई की थी. बदले में पाकिस्तान ने भारत की हवाई सीमा का उल्लंघन किया. भारत- पाकिस्तान के बीच पैदा तनाव की वजह से एक और महत्वपूर्ण घटना जो उस तरह से सुर्ख़ियों में न आ सकी, वह अरुणाचल प्रदेश में वहां के स्थानीय निवासियों द्वारा किया गया बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन है. टकराव की वजह वहां पर ऐसे छः समुदायों को ‘स्थानीय निवासी प्रमाणपत्र’ देने की सिफ़ारिश थी जो मूल रूप से अरुणाचल के निवासी नहीं हैं, लेकिन दशकों से नामसाई और चांगलांग जिलों में रह रहे थे.\n\nतीसरी घटना जो इस हफ़्ते चर्चा का विषय रही, वह है 13 से ज़्यादा चैनलों को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा नोटिस जारी किया जाना. इन चैनलों के ऊपर आरोप है कि उन्होंने पाकिस्तान के सैन्य प्रवक्ता मेजर जनरल गफूर की उस प्रेस कांफ्रेंस को लाइव दिखाया. जिसमें वो भारत को हमले का जवाब देने की धमकी दे रहे थे. सरकार का इस पर कहना रहा कि यह ग़लत परम्परा है, इससे देश की एकता और अखंडता पर संकट पैदा हो सकता है.\n\nइस हफ्ते चर्चा में ‘द ट्रिब्यून’ की डेप्युटी एडिटर स्मिता शर्मा बतौर मेहमान शिरकत की. साथ ही चर्चा में हमारे साथ लेखक-पत्रकार अनिल यादव भी शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.\n\nभारत-पाकिस्तान के बीच तनावपूर्ण माहौल पर चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने एक सवाल रखा कि ऊरी हमले के बाद पिछला जो सर्जिकल स्ट्राइक हुआ और अब ये जो इंडियन एयरफोर्स ने किया है, इससे क्या वह धारणा टूट गई है कि न्यूक्लियर पॉवर रहते हुए भी इस तरह की परिस्थितियां आने पर या किसी तरह की क्रॉस बॉर्डर टेररिज्म की स्थिति में हम पाकिस्तान को जवाब दे सकते हैं? या हम न्यूक्लियर पॉवर होते हुए भी एक लिमिटेड लेवल पर एक दूसरे से कॉन्फ्रंट कर सकते हैं?\n\nइसका जवाब देते हुए स्मिता ने कहा कि अगर आप न्यूक्लियर डेटरेंस की बात करते हैं तो न्यूक्लियर डेटरेंस क्या है? इस कांसेप्ट को लेकर बहुत चर्चाएं होती रहती हैं. जब आपके पास परमाणु हथियार होता है तो क्या वो सही में डेटरेंस का काम करता है? या सामने वाले को और प्रोवोक करता है. सामने वाले को और आक्रामक रवैया अपनाने पर मजबूर करता है. इसकी वजह से हम एक ‘आर्म्स रेस’ देखते हैं.\n\nस्मिता कहती हैं, “इन सबके बीच दो चीज़ें हमें नहीं भूलनी चाहिए. पुलवामा में हमला हुआ, जैश-ए-मोहम्मद ने जिसकी ज़िम्मेदारी ली. 40 जवानों की जानें गईं. भारत जैसे देश में, जो आज विश्व भर में खुद को एक बड़ी पोजीशन पर महसूस कर रहा है. इस वक़्त चुनाव हों या न हों, लेकिन हमले से एक दबाव निश्चित तौर पर बन जाता है सरकार पर कि वो कोई न कोई कार्रवाई ज़रूर करे. भारत ने जवाबी हमला करते हुए कहा कि हमने बालाकोट में गैर सैन्य हमला किया है. और सूत्रों के हवाले से पता चला कि यह बालाकोट दरअसल पाक के कब्जे वाले कश्मीर में नहीं बल्कि खैबर पख्तूनख्वाह में है, जो पाकिस्तान की सीमा के बिल्कुल अंदर है.”\n\nस्मिता आगे कहती हैं,  “भारत, अमेरिका जैसा एक देश हो जो ऐब्टाबाद में घुसकर नेवी सील्स के ज़रिए ओसामा बिन लादेन को मार गिराता है. पर यहां वैसा नहीं है. भारत-पाकिस्तान की सीमाएं लगी हुई हैं. हमारी जो हक़ीकत है वो अमेरिका और पाकिस्तान की हकीकत से अलग है. इसलिए हमें साईट नहीं लूज करनी चाहिए.”\n\nचर्चा को आगे बढ़ाते हुए अतुल ने कहा, “बार बार ये जो स्थिति आती थी कि हम दोनों न्यूक्लियर पॉवर होने की वजह से लगभग तल पर आ गए हैं. ये न्यूक्लियर ब्लैकमेल पाकिस्तान की तरफ से होता था. हम एक सीमा से आगे नहीं जा सकते थे. लेकिन अब ये कहा जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी ने इस धारणा को तोड़ दिया है और यह नया इंडिया है, अब इन सबके रहते हुए भी भारत-पाकिस्तान में जाकर हमला कर सकता है. इसको एक नया टर्म दिया गया कि यह भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में वाटरशेड मोमेंट है.”\n\nयहां पर चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए अनिल कहते हैं कि ‘न्यू इंडिया’ और एक नया चलन शुरू करने वाली जो बात है कि भारत अब पहले की तरह आतंकवाद को सहन करने वाला देश नहीं रहा. हम उस तरह तरह से कार्रवाई करेंगे जैसा की अमेरिका आतंकवाद की स्थिति में करता रहा है. लेकिन मैं थोड़ा पीछे जाना चाहूंगा कि ऑल ऑफ सडेन, अचानक, रातोंरात आप अपना कैरेक्टर नहीं बदल सकते. इसको थोड़ा पॉलिटिकली भी देखना चाहिए कि अगर सचमुच आतंकवाद मोदी सरकार का कंसर्न है तो सडेन एक्शन की बजाय और भी बहुत कुछ है जो किया जा सकता था.","author_name":"Newslaundry.com"}